स ंगीत आ ैर समाज
Description
्रकृति का मूल सिद्वान्त ह ै कि मनूष्य न े अपनी नैस ेर्गिक आवष्यकताओं क े लिये समाज क े अवलम्ब को अवधारित किया उसे
अपने सुखःदुख की हिस्सेदारी एव ं व्यवहारिक बल व असुरक्षा से बचकर क े लिये समाज की सृष्टि करनी पड़ी अथवा समाज
की शरण में जाना पड़ा। बाल्यकाल, युवावस्था, व ृद्वावस्था, अथवा यह कहा जाये कि जीवन क े प ्रत्येक चरण में मनुष्य का े
समाज की आवष्यकता नैसर्गिक होती ह ै। समाज यदि जननी है तो व्यक्ति उसका बालक। विकास की प्रारंभिक अवस्था से
निरन्तर प ्रगति पथ पर बढ़ते ह ुऐ उसने अपनी आवष्यकताओं क े रूप सृजन करना आरंभ किया आ ैर-यही सृजन कलाओं का
उद्गम स्थल बना।
उसे यह पता ही नहीं चला कि कब उसकी इसी सृजनात्मकता ने कलाओं का रूप लिया फिर वा े चाह े स्थापत्य कला, हो या
संगीत अथवा चित्रकारी उदाहरण क े लिये उसने प ्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिये गृह उपव्यकाआ ें को अपना घर बनाया
आ ैर धीरे-धीरे समूहों में अपने घरा ें का निर्माण किया और यही निवास-स्थापत्यकला क े उत्कृष्ट नमूने बने।
इस तरह समाज का विकास व कलाओं का विकास समानान्तर रूप में प ्रगति पाने लगे आ ैर प ्रत्येक समूह समाज का े अपने
भिन्न परिव ेष, संस्कृति व संगीत से प ृथक रूप में पहचाना जाने लगा। यहाँ व्यक्ति का स्वाधिकार कुछ भी नही था जो कुछ
था वह समाज था। अपनी भावनाआ ें की समूह रूप में अभिव्यक्ति कलाओं क े सृजन का मूल भ ूत कारण बनी। अपनी
प ्रसन्नता, दुख, शोभ आदि भावनाओं का े उन्ह ंे किसी ना किसी रूप में अभिव्यक्त करना मनुष्य की आवष्कता बन र्गइ । विकास
क े क्रम में यही समाज धीरे-धीरे ग्राम, नगर, प्रान्त व देश क े रूप में आकृति पाते गये आ ैर विविध-विविध नगर, प ्रान्तों व
देशा े की अपनी संस्कृति व संगीत में परिलक्षित हा ेते गये। मानव हद्य की वे आदिम भावनाएॅ आज भी हद्य स्प ंदन करने में
उतनी ही क्षमताऐं रखती ह ै जितनी वे अपनी प्रांरभिक काल मे रखती थी।