सामाजिक कुरुतियों की रोकथाम में योग की प्रासंगिकता
Description
भारतवर्ष विभिन्नताओं का देश है यहां अनेक धर्मों, जातियों, संप्रदायों के लोग निवास करते हैं, जिनका रहन-सहन भाषा- बोली पहनावा मान्यताएं परस्पर भिन्न है यहां कदम-कदम पर भाषा बदल जाती है, परंतु यह भारत की पहचान है कि अनेकता में एकता दिखाई देती है वहीं दूसरी ओर यह विभिन्न सामाजिक कुरुतियों को जन्म देती है, यह सामाजिक कुरुतियाँ कहीं क्षेत्रवाद के कारण कहीं जातिवाद के कारण तो कहीं भाषावाद के कारण या फिर विभिन्न सम्प्रदाय के कारण समाज में दिखायी देती हैं। भारत में अनेक धर्म एवं सम्प्रदाय फलते-फूलते रहें हैं। उनके अलग- अलग रीति रिवाज होते हैं। यह सभी लोग अपनी अपनी श्रेष्ठता को प्रदर्शित करने के लिए विभिन्न प्रकार के आयोजन करते रहते हैं ऐसी परिस्थितियों में जब एक दूसरे के अहम को ठेस पहुंचती है तो विरोध की स्थिति उत्पन्न होती है, जिससे आपस में एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने की दृष्टि से लड़ाई दंगे चोरी मारपीट आदि सामाजिक अव्यवस्थाओं का उदय होता है, जिसके कारण समाज में अनेक सामाजिक कुरुतियाँ उत्पन्न होती हैं। देश में अंधविष्वास जातिवाद, सम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद, दहेज प्रथा आदि पैर पसारे हुए हैं इनके दुष्परिणाम समाज में स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं जिनके कारण बेरोजगारी, अशिक्षा, भुखमरी, ऊंच-नीच छुआ-छूत आदि घटनाएं समाज में देखने को मिलती हैं। योग के ज्ञान (यम, नियम) एवं अभ्यास द्वारा उपरोक्त कुरूतियों का निवारण कैसे हो सकता है इस शोध पत्र में यह दर्शाने का प्रयास किया गया है।