समयक स्वास्थ्य हेतु योग एवं चेतना विज्ञान के ज्ञान की भूमिका
Authors/Creators
- 1. डीन, योग विज्ञान संकाय, पातंजली विश्वविद्यालय, हरिद्वार, उत्तराखण्ड
Description
सम्पूर्ण स्वास्थ्य को प्राप्त करना समस्त सभ्यतायों एवं संस्कृतियों का प्रयोजन है। शरीर एक ऐसा माध्यम है जिससे सभी
धर्मों का पालन होता है। वर्तमान में भी सम्यक स्वास्थ्य को विष्व स्वास्थ्य संगठन (ॅभ्व्) केवल रोग और अपंगता का
अभाव भर नहीं मानता बल्कि व्यक्ति को संपूर्ण भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक सम्पन्नता की स्थिति को स्वास्थ्य से
जोड़कर देखता है। आयुर्वेद भी सम्यक् स्वास्थ्य हेतु सर्वांग दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है। योग तो सम्यक् स्वास्थ्य हेतु
साधन एवं साध्य रूप में अपना विशद दर्शन प्रस्तुत करता है। आयुर्वेद तो योग के लिए सिद्ांतों को ही सम्यक् स्वास्थ्य
हेतु मूल रूप से विवेचित करता है। योग विद्या ही आदि विद्या या सनातन विद्या है जो कि वेदविद्या के पूर्वही, तुरिय अवस्था
तक जीव को पहंचाने हेतु प्रशास्त हो चुकी थी। जाग्रत से लेकर ब्राम्ही चेतना तक ज्ञान को सार रूप में योग नाम दिया
गया। बिना ज्ञान के अज्ञान का कोई अर्थ ही नहीं है अज्ञान तो ज्ञान के सापेक्ष ज्ञान की मात्रा या स्तर को बुद्धिगम्य बनाने
की एक प्रवृत्ति है जिसे समयानुसंधान कहा जाता है। समयानुसंधान में संसार में जितने प्रकार के साधन हैं उनमें चार
प्रकार के साधन ही श्रेष्ठ है। योग एवं वेदविहित साधन चतुष्टय, सांख्य प्रदर्शित साधनत्रय योगदर्शनोक्त साधन, तंत्र
शास्त्रोक्त साधन। इस प्रकार प्रस्तुत शोध पत्र में सम्यक् स्वास्थ्य की प्राप्ति हेतु योग एवं चेतना विज्ञान के ज्ञान की क्या
भूमिका हो सकती है इस सत्य को प्रस्तुत करने का उद्देश्य निहित है।