Published October 1, 2020
| Version v1
Journal article
Open
मन रे ! जागत रहिए भाई (अलख जगाती कबीर की वाणी और उनकी सामाजिक चेतना)
Authors/Creators
Description
कबीर एक ऐसे विचारक थे जिन्होंने अपने विचारों को समाज तक पहुंचाने के लिए निरंतर समाज से विद्रोह किया। उनकी वाणी जितनी स्वयं के लिए थी उतनी ही उस समाज के लिए भी, जो दिग्भ्रमित था, जिसमें तमाम तरह की धार्मिक विकृतियाँ आ गई थीं, जाति नस्लगत संकीर्णता, छुआछूत, मूर्तिपूजा, छाप – तिलक, बलि प्रथाएं, वेद – कतेब में अंधभक्ति, अपने चरम पर थीं। कबीर ने इन समस्याओं को करीब से परखा व इन जंजालों में फंसे मानव की पीड़ा समझी। जड़ – चेतन, धर्म– समाज, नश्वर–अनश्वर को पूरी तरह से जानने समझने, उन्हें आजमा कर देख लेने के बाद ही वे इस संसार को ‘काजर की कोठरी’ बतलाते हैं और मनुष्य मात्र को इन विकृतियों, बंधनों से मुक्ति की राह दिखाते हैं, अलख जगाते हैं।