Published August 31, 2022 | Version v1

उषा प्रियवदा के "नदी" उपन्यास में प्रवासी स्त्री जीवन का यथार्थ

  • 1. 1हिंदी विभाग अध्यक्ष, कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय ,येवला ,तह - येवला (नाशिक ) 2हिंदी विभाग, कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय ,येवला ,तह - येवला (नाशिक )

Description

प्रस्तावना :

 भारतीय   समाज   सदैव   से   ही   पुरुष   प्रधान   रहा   है।   समाज   में   स्त्री   के   स्वतंत्र   अस्तित्व   का   हमारी   सांस्कृतिक   मान्यताएं ,  रूढ़ियां   परंपराएं   और   रीति - रिवाज   विरोध   करते   हैं।   इसलिए   सदैव   से   ही   स्त्रियों   को   पुरुषों   द्वारा   दबाया   जाता   रहा   है।   आजादी   के   बाद   नारी   को   पुरुषों   के   बंधन   से   मुक्त   करने   के   लिए   अनेक   कानूनी   अधिकार   दिए   गए   परंतु   महिलाओं   में   शिक्षा   की   कमी   के   कारण   वे   अपने   इन   अधिकारों   के   बारे   में   जागरूक   ही   नहीं   हैं।  आज हिंदी साहित्य में नारी ,दलित,आदिवासी एवं किन्नर साहित्य भी भांति ही प्रवासी साहित्य की अपनी जड़े मजबूत करते हुए हिंदी साहित्य को समृद्ध कर रहा है | रोजी-रोटी की तलाश में विदेश जाने वाले लोगों में कुछ लोगों  ने विदेशी धरती पर रहते हुए अपने अनुभवक, अपनी संवेदना को तथा भारत भूमि के प्रति के अपने ममत्व,पीड़ा आदि को शब्दबद्ध किया है |  प्रवासी भारतीय महिला साहित्यकारों में उषा प्रियंवदा का नाम विशेष उल्लेखनीय है। प्रवासी महिला साहित्यकारों में से उषा प्रियंवदा का नाम अग्रगणी है। २०१६ में प्रकाशित नदी उपन्यास वाली स्त्री जीवन के दस्तावेज को चित्रित करने वाला उपन्यास है। प्रवासी साहित्यकार उषा प्रियंवदा कृत्त 'नदी' उपन्यास में स्त्री जीवन की गाथा को प्रस्तुत करने वाला उपन्यास है। यह उपन्यास प्रवासी स्त्री जीवन के मानवीय मूल्यों, नैतिक विचारों से लेकर प्रवासी स्त्री जीवन के विविध स्वरूप को एवं उनके अधिकारों की गाथा कहने वाली उपन्यास कहलाएगी। प्रवास में गए लोगों विशेषकर स्त्रियों के संघर्ष मानसिकता का बिखराव दाम्पत्य जीवन में परिवार में अलगावबोध, घुटन, अकेलापन आदि जीवन की विविध परिस्थितियों का वर्णन प्रवासी लेखिका उषा प्रियंवदा ने किया है।

Files

11.pdf

Files (296.2 kB)

Name Size Download all
md5:f22d6c136d35bdd7ebef12c433476f47
296.2 kB Preview Download