पुरुषार्थों में धर्म का महत्त्व
Authors/Creators
- 1. शोध सहायक, साहित्य संस्थान, जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ (डीम्ड) विश्वविद्यालय, उदयपुर (राज.)
Description
प्रकृति प्रवत्त शक्तियों का सामूहिक विकास और परिष्कार संस्कृति का मूलधार है। निरन्तर सत्य कहते हुए चिरन्तन
सौन्दर्य और मानव प्रेम के मूल तत्त्वों को अनुप्रमाणित करते रहने से ही संस्कृति पुष्पित-पल्लवित होती है। सत्यं, षिवं,
सुन्दररं की अभिलाषा एवं संरक्षण ही संस्कृति का प्राणतत्व है। अपने पुरूषार्थ पर विश्वास करके किसी भी सरल अथवा
दुर्लभ बाधा को पार करने क उत्साह, ओजस्विता एवं महाप्राणता का मंत्र भारतीय संस्कृति ने दिया है। निष्क्रिय होकर
बैठ जाना मृत्यु है, निरन्तर कर्म करते रहना ही जीवन है। भारतीय ऋषियों ने धर्म उसे कहा जो इहलोक से परलोक
दोनों को सिद्ध कर देता है वही धर्म है और वही भारतीय संस्कृति है। वैदिक अर्थव्यवस्था एक स्वतन्त्र अर्थव्यवस्था है जो
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था और समाजवादी अर्थव्यवस्था से बिल्कुल भिन्न है। इस अर्थ व्यवस्था का मूल मंत्र यह है कि अर्थ
हो चाहे काम, उसका मूल धर्म है। काम पुरुषार्थ का संबंध मन से है। काम पुरुषार्थ की सिद्धि के लिये पदार्थों की अपेक्षा
रहती है। उन पदार्थो को उपार्जित करना पुरुषार्थ है। मनुष्य के जीवन में ही ब्रह्मचर्य संभव है। धर्म शास्त्र की शिक्षा देने
के लिए प्रार्थना की थी। तन्त्रवार्तिक के अनुसार धर्मशास्त्रों का कार्य है वर्णों एवं आश्रमों के धर्मो की शिक्षा देना है।