Published December 24, 2021 | Version v1

दलित पैंथर के संस्थापक ज.वि.पवार से राजश्री सैकिया की बातचीत

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  • 1. Assam University

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ज. वि. पवार दलित-पैंथर के संस्थापकों में एक रहे हैं। इस संगठन ने 1980 के दशक के शुरूआती वर्षों में अपनी गतिविधियों से भारत ही नहीं, दुनिया भर का ध्यान खींचा था। इसी संगठन को दलित-साहित्य का जनक भी माना जाता रहा है। लेकिन तथ्य यह है कि “दलित-साहित्य” ही “दलित-पैंथर” का जनक रहा है। पवार एक कौंध की तरह यह ध्यान दिलाते हैं कि संगठन और आंदोलन से पहले साहित्य है, इसलिए दलित-साहित्य को अधिक अहमियत दी जानी चाहिए।   यह सब कैसे शुरू  हुआ, कैसे तत्कालीन सरकार ने इस संगठन को पंगु बना डालने के लिए सुनियोजित अभियान चलाया और दलित साहित्य की मूल अवधारणा क्या रही है, आदि प्रश्नों पर दलित साहित्य अध्येता व युवा आलोचक राजश्री सैकिया ने ज वि पवार से बातचीत की।

Notes

दलित साहित्य की धारणा तो पहले से ही मौजूद थी। बाबासाहेब के विचार दलित साहित्य के विचार थे। जब हमने दलित पैंथर की स्थापना की तो एक तरह का दबाव-कक्ष बन गया। दलित-पैंथर की हर जगह चर्चा होने लगी तो उसी के साथ दलित साहित्य का भी चर्चा होने लगी। इस तरह से दलित-पैंथर जैसे-जैसे अमेरिका, लंदन जैसे देशों में पहुंचा, उसी के साथ-साथ दलित साहित्य भी हर जगह पहुंचा। दलित पैंथर के कारण दलित साहित्य का भूमंडलीकरण हुआ- ज . वि. पवार

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