मूक-बधिर विद्यार्थियों में शैक्षणिक अभिरूची व शैक्षणिक उपलब्धि का सहसंबंधात्मक अध्ययन
Description
शिक्षा के क्षेत्र में सामान्य बालको को शिक्षा हेतु विस्तृत क्षेत्र व अवसर प्रदान किये जाते है । असामान्य बालक जैसे मूक-बधिर बालक इन्हें केवल व्यवसायिक शिक्षा पर ही अधिक बल दिया जाता है उन्हें शिक्षा के अवसर इस हेतु प्रदान नही किये जाते क्योंकि उन्हें शिक्षा देते समय अनेक समस्यायें आती है । यदि उन्हें इंजीनियरिंग, पेंटींग, नृत्य, कला, साहित्य आदि क्षेत्र उनकी रूचि अनुसार शिक्षा दी जाये तो वे अवश्य प्रगति कर सकते है क्योंकि योग्यता दर्शाने हेतु केवल वाक्य रचना ही मार्ग नही है अनेक मार्गो द्वारा मूक-बधिर बालक अपनी योग्यता को दर्शा कर शिक्षा क्षेत्र में प्रगति कर सकते है ।
नवजात शिशु असहाय तथा असामाजिक होता है । वह न बोलना जानता है, न चलना-फिरना, उसके न कोई मित्र होते है, न कोई शत्रु और न ही उसमें किसी आदर्श तथा मुल्यों को प्राप्त करने की जिज्ञासा पायी जाती है । परंतु जैसे-जैसे उस पर शिक्षा के औपचारिक तथा अनौपचारिक साधनों का प्रभाव पड़ जाता है वैसे-वैसे वह सामाजिक, शारीरिक, मानसिक एवं संवेगात्मक रूप से विकसित होता जाता है । वह सफलतापूर्वक अपने उत्तरदायित्वों को निभाने के योग्य बन जाता है । इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि शिक्षा हमारे लिए कितनी आवश्यक है, शिक्षा के द्वारा ही व्यक्ति की कीर्ति का प्रकाश चारों और फैलता है तथा शिक्षा ही व्यक्ति की समस्याओं को सुलझाती है एवं जीवन को सुसंस्कृत बनाती है ।
शिक्षा का जीवन में कितना महत्व है यह दृष्टिगोचर होता है । परंतु यही शिक्षा सामान्य बालको के अलावा शारीरिक रूप से असामान्य जैसे मूक-बधिर बालको को दी जायें तो, मन में हजारो सवाल उठ खडे होंगे । मूक-बधिरों को शिक्षा कैसे दी जाती होगी ? किस प्रकार दी जाती होगी ? बिना भाषा के क्या यह सम्भव है ? जैसे अनेक सवाल है ।