Published August 16, 2018 | Version v1

पुराण और प्राचीन साहित्य - भक्तिकाव्य धारा

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Description

सामान्यत: ' पुराण '  शब्द का अर्थ प्राचीन कथाओं के संग्रह से समझा जाता है | अमरकोशकार ने पुरातन और चिर नवीन स्वरूप की ओर संकेत करते हुए कहा है  -
     पुराणे प्रतनप्रत्न  पुरातन चिरन्तनम् |
     प्रत्यगोअभिनवो नव्य नवीनों नूतनोंनव: || 

कतिपय पुराणों में भी शब्द की परिभाषा  देते हुए कहा गया है ---
     सर्गश्च प्रतिसर्गश्त वंश मन्वन्तराणि च | 
     वंशानुचरितं चैन पुराण पंचलक्षणम् ||

अर्थात् जिस ग्रन्थ में सर्ग,  प्रतिसर्ग,  वंश,  मन्वनतर  तथा वंशानुचरित का वर्णन हो उसे पुराण कहा जाता है | किन्तु पुराणों में मात्र सर्ग,  प्रतिसर्ग,  अथवा राजवंशावली का वर्णन ही नहीं है  वरन हमारी संस्कृति, हमारा  सम्पूर्ण लौकिक एवं धार्मिक जीवन सन्निहित है | 
     भारत मुख्यतः  धर्मप्रधान देश है | अतः तद्नुरूप प्राचीन भारतीय साहित्य  का विकास  भी धार्मिक रूप में  हुआ है | इसके अतिरिक्त साहित्यकों का दृष्टिकोण आदेशात्मक था | एक ओर उनके जीवनदर्शन का एक रूप उनकी धर्मसाधना थी,  दूसरी ओर लौकिक जीवन में भी उदात्त  मानवीय गुणों को ही महत्ता मिली थी | परिणामस्वरूप संस्कृत साहित्य में केवल उदात्त चरित्र ही नाटक तथा महाकाव्य के नायक बन सकते थे| संस्कृत साहित्य में पुराणों की कथाएं को माध्यम बना कर नाटक तथा काव्य ग्रन्थ रचना की व्यापक परम्परा वर्तमान है |

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References

  • हिन्दी साहित्य कोश - ज्ञान मंडल लिमिटेड, प्रथम संस्करण, २०२० वि ०
  • रामायण - श्री राधेश्याम (कथावाचक), सन १९६९, बरेली
  • राधाकृष्ण ग्रंथावली - श्री रामकृष्णदास सं श्याम सुंदर दास, प्रथम संस्करण, १९३०, इंडियन प्रेस लिमिटेड, प्रयाग