स्वतंत्रता संग्राम में बिरसा मुंडा का नेतृत्व ('धरती आबा' नाटक के विशेष संदर्भ में)
Authors/Creators
- 1. आर्ट्स कॉमर्स अॅण्ड सायन्स कॉलेज, पिंपळनेर, ता. जि. बीड.
Description
साहित्य की विविध विधाओं में नाटक का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। नाटककार केवल मनोरंजन का माध्यम प्रस्तुत नहीं करते, बल्कि वे समाज, संस्कृति और इतिहास को रंगमंच के माध्यम से जीवंत बनाते हैं। हिंदी रंगमंच के इतिहास में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि समकालीन नाटककारों ने भारतीय परिवेश और जनजीवन को केंद्र में रखकर मानवीय संवेदनाओं का सशक्त चित्रण किया है। उन्होंने परंपरागत नाट्य शैलियों को नवीन रंग-शिल्प के साथ मिलाकर नाट्य-साहित्य को एक नई दिशा प्रदान की है।
भारतीय इतिहास के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि यहाँ अनेक ऐसे राष्ट्रीय व्यक्तित्व उभरे हैं, जिन्होंने अपने अदम्य साहस, संघर्षशीलता और सामाजिक चेतना के बल पर देश के इतिहास को गौरवमयी बनाया। इन्हीं में एक प्रमुख नाम बिरसा मुंडा का है। बिरसा मुंडा ने न केवल ब्रिटिश शासन का विरोध किया, बल्कि आदिवासी समाज को संगठित कर उनके अधिकारों, संस्कृति और अस्मिता की रक्षा के लिए एक व्यापक आंदोलन खड़ा किया। उनका मानना था कि मनुष्य का भय ही उसे गुलाम बनाता है, और इसलिए उन्होंने अंधविश्वास एवं कर्मकांडों से मुक्ति का मार्ग सुझाया।
हृषीकेश सुलभ द्वारा लिखित ‘धरती आबा’ नाटक बिरसा मुंडा के जीवन-संघर्षों पर आधारित एक ऐतिहासिक नाटक है। यह नाटक उन्हें आदिवासी समुदाय का ‘जननायक’ स्थापित करता है और साथ ही यह दर्शाता है कि स्वतंत्रता का संग्राम केवल राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के बीच भी उतनी ही गहराई से लड़ा गया। इस दृष्टि से ‘धरती आबा’ स्वतंत्रता-संघर्ष की जनपक्षीय चेतना और आदिवासी अस्मिता का महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
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