IKS और स्वदेशी ज्ञान - आदिवासियों के साथ सेतु निर्माण और ग्रामीण समुदाय
Authors/Creators
- 1. सहायक प्रोफेसर, शिक्षा संकाय, आई. ए. एस. ई. (मानित विश्वविद्यालय), गाँधी विद्या मन्दिर, सरदारषहर, चूरु, राजस्थान, भारत
Description
भारत की सांस्कृतिक धरोहर और परंपराओं का सबसे सशक्त हिस्सा है-स्वदेशी ज्ञान प्रणाली (Indigenous Knowledge Systems – IKS)। यह ज्ञान आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के जीवन, संस्कृति, कृषि, चिकित्सा, पर्यावरण संरक्षण तथा सामाजिक संरचना में गहराई से निहित है। सदियों से यह प्रणाली केवल जीविका का आधार ही नहीं रही, बल्कि सामाजिक समरसता, प्रकृति के साथ संतुलन और आत्मनिर्भरता का प्रतीक भी रही है।
आधुनिक विकास प्रक्रियाओं और पश्चिमी वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बढ़ते प्रभाव के कारण स्वदेशी ज्ञान की उपेक्षा हुई है। इसके परिणामस्वरूप न केवल ग्रामीण और आदिवासी समुदायों में पहचान का संकट उत्पन्न हुआ है, बल्कि पारंपरिक ज्ञान, प्रथाओं और सांस्कृतिक धरोहर का ह्रास भी देखने को मिल रहा है। यही कारण है कि आज विकास की नीतियों और योजनाओं में IKS को पुनः केंद्र में लाने की आवश्यकता है।
यह शोध-पत्र इस बात की पड़ताल करता है कि किस प्रकार IKS और स्वदेशी ज्ञान के माध्यम से आदिवासी समाज तथा ग्रामीण समुदाय के बीच सेतु निर्माण किया जा सकता है। इसका उद्देश्य केवल परंपरागत ज्ञान को पुनर्जीवित करना नहीं है, बल्कि आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ उसके समन्वय द्वारा एक सतत्, समावेशी और न्यायपूर्ण विकास मॉडल प्रस्तुत करना है।
शोध में यह विशेष रूप से रेखांकित किया गया है कि -
ग्रामीण विकास में स्वदेशी कृषि पद्धतियाँ, जल संरक्षण तकनीकें और प्राकृतिक संसाधनों के सतत् उपयोग की भूमिका क्या हो सकती है।
सतत् आजीविका के लिए पारंपरिक हस्तशिल्प, औषधीय पौधों का उपयोग और लघु उद्यम किस प्रकार सहायक हो सकते हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में IKS का समावेश न केवल स्थानीय भाषा और संस्कृति को संरक्षित करेगा, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने में मदद करेगा।
सामाजिक न्याय की दिशा में यह ज्ञान प्रणाली हाशिए पर खड़े समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित कर सकती है।
अतः यह शोध इस निष्कर्ष की ओर अग्रसर है कि यदि स्थानीय और वैष्विक ज्ञान प्रणालियों का समन्वय कर एक संतुलित विकास दृष्टिकोण अपनाया जाए, तो न केवल आदिवासी और ग्रामीण समाज में आत्मबल और पहचान की पुनस्र्थापना होगी, बल्कि सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति की दिशा में भी एक ठोस कदम उठाया जा सकेगा।
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